गुरुवार, 28 जुलाई 2016

फ्रेंच कट अंडरवियर - क्या आप भी पहनते है ?


क्या आप भी फ्रेंच कट अंडर विअर पहनते है ?






यदि हाँ तो थोडा संभल जाइये --
आपकी सेक्सुअल लाइफ सिकुड़ रही है. 
आप नपुंसकता की ओर जा रहे है.
आप कामुक बन रहे है.
आपका वीर्य कमजोर हो रहा है.
आपकी सेक्स करने की क्षमता समाप्त हो रही है.

क्यों ?????????????????????????


दोस्त पुरुष शरीर की रचना प्रकृति ने इस प्रकार की है की वाह्य तापमान के अनुसार शरीर वीर्य की रक्षा कर सके. जैसे आपने देखा होगा की तनध के दिनों में अंडकोष शरीर से बिलकुल चिपके रहते है जबकि गर्मी के दिनों में वे थोडा लटके हुए होते है.
   ऐसा इसलिए होता है की वीर्य को सुरक्षित रहने के लिए एक निश्चित तापमान की आवश्यकता होती है जब वाह्य वातावरण का तापमान  उस तापमान से ज्यादा गर्म होता है तो अंडकोष शरीर से थोड़ी दूरी बना लेते है जिससे वाह्य वातावरण का जो प्रभाव शरीर पर पड़े उससे वीर्य सुरक्षित रह सके.

  इसी प्रकार जब वाह्य वातावरण का तापमान वीर्य के तापमान से ज्यादा ठंढा होता है तो अंडकोष शरीर से चिपक जाते है जिससे उन्हें शरीर से गर्माहट मिलती रहे.

इसमें फ्रेंच कट की भूमिका-

फ्रेंच कट अंडरवियर ज्यादा से ज्यादा शरीर से चिपकी हुई होती है जिससे वीर्य को सुरक्षित करने वाले अंडकोष तापमान के हिसाब से अपना नियमन नही कर पाते. परिणाम वीर्य का कमजोर होते जाना. ये ठीक वैसा ही है जैसे ठंढ के समय आपको गर्माहट न मिले/ गर्मी के समय आपको ठंढक न मिले.


दूसरा बड़ा नुकसान यह होता है की आपका ज्यादा से ज्यादा ध्यान हमेशा सेक्स की ओर रहेगा. क्योकि चड्ढी जब हमेशा आपके शरीर चिपकी रहेगी तो आप ध्यान हमेशा इस बात पर रहेगा की आपके शरीर में एक पार्ट ये भी है .जब ये याद आएगा तो इसका उपयोग भी याद आएगा. मतलब किसी न किसी बहाने आपके दिमाग में सेक्स जन्म लेता रहेगा. बार बार सोते जागते इसकी छवि आपके मष्तिष्क में बनती रहेगी --उसी प्रकार की छवि आपको हमेशा आकर्षित करेगी परिणामस्वरूप - ज्यादा सेक्स-- ज्यादा हस्तमैथुन-- ज्यादा सेक्स की चर्चा ---- इन सबके परिणाम में  छोटी व् कमजोर सेक्सुअल लाइफ.

तो पूरी दुनिया में क्यों पहना जाता है फ्रेंच कट अंडरवियर --

आप गौर से देखिये और पता करिए की किन -किन देशों में फ्रेंच कट चड्ढी ज्यादा पहनी जाती है?

आप पाएंगे की जिन भी देशों में फ्रेंच कट ज्यादा पहना जाता है वो सभी ठंढे तापमान वाले देश है वहां की जरुरत है ये. और हम आप फैशन के चक्कर में इसे अपनाते जा रहे हैं.

यदि आप खिलाडी है तो केवल उसी समय पहने जब खेल रहे हों. इसे रेगुलर न करें.

यदि आप सामान्य तौर पर फ्रेंच कट पहनते है तो बस इतना ध्यान रखें की केवल सर्दियों में ही पहने इससे आपको फायदा भी होगा .

बाकी के मौसम में नार्मल चड्ढी पहने .

 भरपूर सेक्सुअल जीवन का आनंद ले.

ज्यादा दिन तक आनंद लेते रहें..................

जीवन में रस रहेगा तभी तो जीवन में आनंद रहेगा.

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

काम राग.....


                                             
काम, जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्मअर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है।
प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अविभक्त तत्व था वह विश्वरचना के लिए दो विरोधी भावों में आ गया। इसी को भारतीय विश्वास में यों कहा जाता है कि आरंभ में प्रजापति अकेला था। उसका मन नहीं लगा। उसने अपने शरीर के दो भाग। वह आधे भाग से स्त्री और आधे भाग से पुरुष बन गया। तब उसने आनंद का अनुभव किया। स्त्री और पुरुष का युग्म संतति के लिए आवश्यक है और उनका पारस्परिक आकर्षण ही कामभाव का वास्तविक स्वरूप है। प्रकृति की रचना में प्रत्येक पुरुष के भीतर स्त्री और प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की सत्ता है। ऋग्वेद में इस तथ्य की स्पष्ट स्वीकृति पाई जाती है, जैसा अस्यवामीय सूक्त में कहा है—जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं; जिसके आँख हैं वह इस रहस्य को देखता है; अंधा इसे नहीं समझता। (स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध:। - ऋग्वेद, ३। १६४। १६)।
इस सत्य को अर्वाचीन मनोविज्ञान शास्त्री भी पूरी तरह स्वीकार करते हैं। वे मानते हैं कि प्रत्येक पुरुष के मन में एक आदर्श सुंदरी स्त्री बसती है जिसे "अनिमा' कहते हैं और प्रत्येक स्त्री के मन में एक आदर्श तरुण का निवास होता है जिसे "अनिमस' कहते हैं। वस्तुत: न केवल भावात्मक जगत्‌ में किंतु प्राणात्मक और भौतिक संस्थान में भी स्त्री और पुरुष की यह अन्योन्य प्रतिमा विद्यमान रहती है, ऐसा प्रकृति की रचना का विधान है। कायिक, प्राणिक और मानसिक, तीन ही व्यक्तित्व के परस्पर संयुक्त धरातल हैं और इन तीनों में काम का आकर्षण समस्त रागों और वासनाओं के प्रबल रूप में अपना अस्तित्व रखता हे। अर्वाचीन शरीरशास्त्री इसकी व्याख्या यों करते हैं कि पुरुष में स्त्रीलिंगी हार्मोन (Female sex hormones) और स्त्री में पुरुषलिंगी हार्मोंन (male sex hormones) होते हैं। भारतीय कल्पना के अनुसार यही अर्धनारीश्वर है, अर्थात प्रत्येक प्राणी में पुरुष और स्त्री के दोनों अर्ध-अर्ध भाव में सम्मिलित रूप से विद्यमान हैं और शरीर का एक भी कोष ऐसा नहीं जो इस योषा-वृषा-भाव से शून्य हो। यह कहना उपयुक्त होगा कि प्राणिजगत्‌ की मूल रचना अर्धनारीश्वर सूत्र से प्रवृत्त हुई और जितने भी प्राण के मूर्त रूप हैं सबमें उभयलिंगी देवता ओत प्रोत है। एक मूल पक्ष के दो भागों की कल्पना को ही "माता-पिता' कहते हैं। इन्हीं के नाम द्यावा-पृथिवी और अग्नि-सोम हैं। द्यौ: पिता, पृथिवी मता, यही विश्व में माता-पिता हैं। प्रत्येक प्राणी के विकास का जो आकाश या अंतराल है, उसी की सहयुक्त इकाई द्यावा पृथिवी इस प्रतीक के द्वारा प्रकट की जाती है। इसी को जायसी ने इस प्रकार कहा है :
एकहि बिरवा भए दुइ पाता,
सरग पिता औ धरती माता।
द्यावा पृथिवी, माता पिता, योषा वृषा, पुरुष का जो दुर्धर्ष पारस्परिक राग है, वही काम है। कहा जाता है, सृष्टि का मूल प्रजापति का ईक्षण अर्थात्‌ मन है। विराट् में केंद्र के उत्पत्ति को ही मन कहते हैं। इस मन का प्रधान लक्षण काम है। प्रत्येक केंद्र में मन और काम की सत्ता है, इसलिए भारतीय परिभाषा में काम को मनसिज या संकल्पयोनि कहा गया है। मन का जो प्रबुद्ध रूप है उसे ही मन्यु कहते हैं। मन्यु भाव की पूर्ति के लिए जाया भाव आवश्यक है। बिना जाया के मन्यु भाव रौद्र या भयंकर हो जाता है। इसी को भारतीय आख्यान में सत्ती में सती से वियुक्त होने पर शिव के भैरव रूप द्वारा प्रकट किया गया है। वस्तुत: जाया भाव से असंपृक्त प्राण विनाशकारी है। अतृप्त प्राण जिस केंद्र में रहता है उसका विघटन कर डालता है। प्रकृति के विधान में स्त्री पुरुष का सम्मिलन सृष्टि के लिए आवश्यक है और उस सम्मिलन के जिस फल की निष्पति होती है उसे ही कुमार कहते हैं। प्राण का बालक रूप ही नई-नई रचना के लिए आवश्यक है और उसी में अमृतत्व की श्रृंखला की बार-बार लौटनेवाली कड़ियाँ दिखाई पड़ती हैं। आनंद काम का स्वरूप है। यदि मानव के भीतर का आकाश आनंद से व्याप्त न हो तो उसका आयुष्यसूत्र अविच्छन्न हो जाए। पत्नी के रूप में पति अपने आकाश को उससे परिपूर्ण पाता है।
अर्वाचीन मनोविज्ञान का मौलिक अन्वेषण यह है कि काम सब वासनाओं की मूलभूत वासना है। यहाँ तक तो यह मान्यता समुचित है, किंतु भारतीय विचार के अनुसार काम रूप की वासना स्वयं ईश्वर का रूप है। वह कोई ऐसी विकृति नहीं है जिसे हेय माना जाए।
इस नियम के अनुसार काम प्रजनन के लिए अनिवार्य है और उसका वह छंदोमय मर्यादित रूप अत्यंत पवित्र है। काम वृत्ति की वीभत्स व्याख्या न इष्ट है, न कल्याणकारी। मानवीय शरीर में जिस श्रद्धा, मेधा, क्षुधा, निद्रा, स्मृति आदि अनेक वृत्तियों का समावेश है, उसी प्रकार काम वृत्ति भी देवी की एक कला रूप में यहाँ निवास करती है और वह चेतना का अभिन्न अंग है।

बात है तो केवल इतनी की काम की गहराई को समझा जाये....